गोगुंडा की पहाड़ियों पर तेंदूपत्ता संग्रहण से बदली तस्वीर — कभी नक्सल गढ़ रहा क्षेत्र अब आजीविका और विकास का नया केंद्र
सुकमा :- जिले के दुर्गम वनांचल में स्थित गोगुंडा की पहाड़ियां, जो एक समय नक्सल गतिविधियों के प्रभाव के कारण भय और असुरक्षा का प्रतीक मानी जाती थीं, आज विकास, विश्वास और आजीविका के नए अध्याय की गवाह बन रही हैं। वन विभाग द्वारा इस क्षेत्र में पहली बार तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य प्रारंभ किया गया है, जिससे स्थानीय आदिवासी समुदाय में उत्साह और नई उम्मीद का संचार हुआ है।
वन विभाग ने यहां आदिवासी संग्राहकों की सुविधा एवं रोजगार के उद्देश्य से पहाड़ी क्षेत्र में दो नए फड़ — गोगुंडा फड़ एवं मिचिगुड़ा फड़ — प्रारंभ किए हैं। यह पहली बार है जब इन दुर्गम पहाड़ियों में संगठित रूप से तेंदूपत्ता संग्रहण किया जा रहा है। विभाग को इन दोनों फड़ों से इस सीजन में 200 से अधिक मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रहण होने की उम्मीद है, जिससे स्थानीय वनवासियों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।
यह सकारात्मक परिवर्तन सुरक्षा बलों के लगातार सहयोग, क्षेत्र में उनकी सतत उपस्थिति और शांति एवं विश्वास बहाली के निरंतर प्रयासों से संभव हो सका है। सुरक्षा बलों द्वारा क्षेत्र में सुरक्षा का वातावरण निर्मित किए जाने से अब शासन की योजनाएं अंतिम छोर तक पहुंच रही हैं और वन विभाग को भी ऐसे दुर्गम इलाकों में आजीविका आधारित गतिविधियां प्रारंभ करने का अवसर मिला है।
वर्षों तक नक्सल प्रभाव के कारण यह क्षेत्र शासन की योजनाओं और मूलभूत सुविधाओं से दूर रहा। ग्रामीणों का जंगल से संबंध केवल जीवन-यापन तक सीमित था, लेकिन बाजार और संस्थागत समर्थन के अभाव में उन्हें वनोपज का उचित लाभ नहीं मिल पाता था। अब वन विभाग की सक्रिय पहल, सुरक्षा बलों के सतत सहयोग तथा शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभाव से हालात तेजी से बदल रहे हैं।
तेंदूपत्ता संग्रहण जैसे रोजगारोन्मुखी कार्यों के माध्यम से न केवल स्थानीय आदिवासियों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि शासन और ग्रामीणों के बीच विश्वास का सेतु भी मजबूत होगा। जिन पहाड़ियों पर कभी बंदूक की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब तेंदूपत्ता तोड़ते संग्राहकों की चहल-पहल और विकास की नई आहट सुनाई दे रही है।
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि विभाग का उद्देश्य केवल वनोपज संग्रहण तक सीमित नहीं है, बल्कि दूरस्थ वनांचलों में रहने वाले आदिवासी परिवारों को स्थायी आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना और विकास की प्रक्रिया में सहभागी बनाना है। गोगुंडा और मिचिगुड़ा फड़ की शुरुआत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
गोगुंडा की पहाड़ियों पर शुरू हुआ यह संग्रहण कार्य इस बात का प्रतीक है कि सुरक्षा, विकास और जनभागीदारी के समन्वित प्रयासों से नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र भी आत्मनिर्भरता और समृद्धि की नई राह पर आगे बढ़ सकते हैं। अब यह क्षेत्र भय का नहीं, बल्कि रोजगार, विश्वास और नए भविष्य की उम्मीद का प्रतीक बनकर उभर रहा है।
