सुकमा में करोड़ों का धान बर्बाद, विभाग दे रहा सूखत का बहाना
सुकमा :- समर्थन मूल्य पर किसानों से खरीदे गए धान की सुरक्षा और समय पर उठाव को लेकर किए जाने वाले सरकारी दावों की सुकमा जिले में पोल खुलती नजर आ रही है। संग्रहण वर्ष 2024-25 में खरीदे गए धान का बड़ा हिस्सा अब सवालों के घेरे में है। जिला स्तरीय समिति के भौतिक सत्यापन में 1115.86 मैट्रिक टन धान रिकॉर्ड से गायब पाया गया है, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 2 करोड़ 68 लाख रुपए बताई जा रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार संग्रहण केंद्र में कुल 24 हजार 857.85 मैट्रिक टन धान भंडारित किया गया था। इनमें से 22 हजार 445.34 मैट्रिक टन धान का उठाव किया गया। इसके बाद ऑनलाइन रिकॉर्ड में 2411.66 मैट्रिक टन धान शेष दर्शाया गया। लेकिन जब जिला स्तरीय समिति ने मौके पर पहुंचकर भौतिक सत्यापन किया तो वहां केवल 1295.90 मैट्रिक टन धान ही मौजूद मिला।

यानी रिकॉर्ड और वास्तविक भंडारण के बीच 1115.86 मैट्रिक टन धान का बड़ा अंतर सामने आया है। विभाग इस अंतर को “सूखत” बता रहा है, लेकिन सवाल यह है कि हजार टन से अधिक धान आखिर कैसे गायब हो गया। जबकि धान खरीदी से लेकर भंडारण और परिवहन तक निगरानी की बहुस्तरीय व्यवस्था होने का दावा किया जाता है।
समय पर उठाव नहीं होने के कारण बड़ी मात्रा में धान संग्रहण केंद्रों में ही पड़ा रहा। कस्टम मिलिंग के लिए राइस मिलों तक धान नहीं पहुंचाया गया और लक्ष्य पूरा होने का हवाला देकर इसे लंबे समय तक खुले में रखा गया। परिणामस्वरूप धूप, बारिश और मौसम की मार से धान की गुणवत्ता लगातार खराब होती चली गई। स्थिति यह है कि संग्रहण केंद्र में मौजूद 1295.90 मैट्रिक टन धान भी अब लगभग अमानक हो चुका है। डेढ़ साल से अधिक समय तक खुले वातावरण में पड़े रहने के कारण इसकी गुणवत्ता प्रभावित हुई है और यह निर्धारित मिलिंग एवं भंडारण मानकों पर भी खरा नहीं उतर रहा।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपए मूल्य का धान आखिर किसकी लापरवाही से बर्बाद हुआ? क्या वास्तव में यह पूरा अंतर केवल सूखत का परिणाम है या फिर इसके पीछे कोई और कारण भी है? मामले के सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली और धान प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
