बस्तर के मूलवासियों के नाम पत्र : मनीष कुंजाम ने उठाए जल, जंगल, जमीन और संस्कृति की सुरक्षा पर सवाल

सुकमा :- विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर बस्तरिया राज मोर्चा के नेता मनीष कुंजाम ने बस्तर के मूलवासियों के नाम पत्र जारी कर जल, जंगल, जमीन, आदिवासी संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।

मनीष कुंजाम ने कहा कि 9 अगस्त को दुनिया भर में आदिवासी समाज विश्व आदिवासी दिवस मनाएगा। अब यह दिवस केवल नृत्य और संगीत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित आदिवासी अधिकारों के प्रावधानों की समीक्षा का अवसर भी है।

उन्होंने बताया कि बस्तरिया राज मोर्चा द्वारा सुकमा जिले के तीनों ब्लॉक क्षेत्रों में 5, 6 और 7 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस की प्रासंगिकता एवं महत्व को लेकर सेमिनार आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में जल, जंगल, जमीन और बस्तर की संस्कृति के भविष्य को लेकर कार्यकर्ताओं एवं ग्रामीणों के साथ चर्चा की गई।

पत्र में बस्तर में बढ़ती खनन गतिविधियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रावघाट, आमदई और अन्य क्षेत्रों में लौह अयस्क खनन जारी है, जबकि बैलाडीला क्षेत्र में पिछले कई दशकों से खनन हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि खनन, परिवहन, रेलवे लाइन और स्लरी पाइपलाइन जैसी परियोजनाओं के विस्तार से बड़े पैमाने पर जंगल और पर्यावरण प्रभावित होने की आशंका है।

मनीष कुंजाम ने बोधघाट परियोजना सहित क्षेत्र में प्रस्तावित और जारी विकास परियोजनाओं को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों के लिए पानी और जमीन की आवश्यकता होगी और इसका सीधा असर बस्तर के आदिवासी समुदायों पर पड़ सकता है।

उन्होंने बैलाडीला को केवल लौह अयस्क का पहाड़ नहीं, बल्कि कोया और गोंड समाज की आस्था से जुड़ा क्षेत्र बताते हुए कहा कि यहां के पहाड़ आदिवासी समाज के देवी-देवताओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हुए हैं। ऐसे में खनन गतिविधियों के विस्तार से आदिवासी संस्कृति और आस्था पर भी खतरा उत्पन्न होने की चिंता है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को अपने संवैधानिक अधिकारों, पेसा कानून और वनाधिकार मान्यता कानून के प्रावधानों को समझने और ग्रामसभा की शक्तियों का उपयोग करने की जरूरत है। खनिज संसाधनों के दोहन और विकास परियोजनाओं में स्थानीय मूलवासियों को वास्तविक लाभ मिल रहा है या नहीं, इस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

मनीष कुंजाम ने आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि गुण्डाधुर, आयतु माहरा, रोड़ा पेंदा, गेंद सिंह, जाड़ा सिरसा और डेबरूधुर जैसे आदिवासी नायकों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष किया और बलिदान दिया।

उन्होंने सवाल उठाया कि जिस तरह अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन में लोगों ने अपनी आस्था के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया, क्या उसी तरह आदिवासी समाज भी अपनी आस्था, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए एकजुट होगा?

उन्होंने कहा कि 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासी समाज, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व को इन सवालों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जल, जंगल, जमीन और आदिवासी संस्कृति की रक्षा के लिए समाज की आवाज मजबूत होनी चाहिए।

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