सुकमा में आदिवासी बेटियों का नेतृत्व, तेंदूपत्ता प्रबंधन में महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव की बयार, युवा महिलाओं ने संभाली वनोपज समितियों की कमान
सुकमा :- सुकमा जिला कभी नक्सल प्रभावित अंचल के रूप में पहचाने जाने वाला सुकमा अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। जिले के दूरस्थ क्षेत्रों जग्गावरम और फूलबगड़ी में आज आदिवासी बेटियां तेंदूपत्ता प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का नेतृत्व कर रही हैं और महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन रही हैं।

जग्गावरम प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति की 23 वर्षीय युवा प्रबंधक कु. दिल्पा किच्चे अपने कुशल नेतृत्व से नई पहचान बना रही हैं। वे 30 फड़ों का सफल संचालन करते हुए लगभग 5000 मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रहण का लक्ष्य संभाल रही हैं। इस कार्य के जरिए करीब 2.5 करोड़ रुपये का भुगतान संग्राहकों को किया जाएगा, जिससे हजारों स्थानीय परिवारों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा।
वहीं फूलबगड़ी प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति में 22 वर्षीय कु. पुष्पा मड़काम भी अपने नेतृत्व से क्षेत्र में नई ऊर्जा भर रही हैं। उनके प्रबंधन में 16 फड़ों के माध्यम से लगभग 4000 मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रहण का अनुमान है, जिसके लिए करीब 2 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा। यह पहल विशेष रूप से महिलाओं और वन आश्रित परिवारों की आजीविका को मजबूत कर रही है।
इस बदलाव के पीछे पारदर्शी और निष्पक्ष नियुक्ति प्रक्रिया की अहम भूमिका रही है। योग्यता के आधार पर स्थानीय युवाओं को जिम्मेदारी मिलने से आदिवासी क्षेत्रों की प्रतिभाएं सामने आ रही हैं और अब वे विकास की धारा में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं।
खास बात यह है कि जग्गावरम और फूलबगड़ी जैसे क्षेत्र, जो कभी नक्सल गतिविधियों के केंद्र माने जाते थे, आज रोजगार, विकास और महिला नेतृत्व के नए केंद्र बनते जा रहे हैं।
तेंदूपत्ता प्रबंधन में इन युवा महिलाओं की भागीदारी सिर्फ प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, नेतृत्व और सामाजिक बदलाव की एक मजबूत कहानी है।
सुकमा की ये बेटियां आज पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।
