तुमालपाड़ पहाड़ पर अवैध खनन का हमला, डेढ़ महीने में पूरी पहाड़ी समाप्त होने की आशंका
सुकमा के तुमालपाड़ में दो क्रशर प्लांट से धड़ल्ले से हो रहा पत्थर खनन। खनिज विभाग बोला- एनओसी अब तक नहीं दी, सिर्फ आवेदन मिला है।
सुकमा — जिले के घोर नक्सल प्रभावित रहे तुमालपाड़ के जंगलों में नियमों को दरकिनार कर पहाड़ों का सीना चीरने का काम जारी है। सड़क निर्माण के नाम पर बिना वैध अनुमति पहाड़ों से बड़े पैमाने पर पत्थर निकाले जा रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि पहाड़ का करीब आधा हिस्सा खत्म हो चुका है और वर्तमान रफ्तार से खनन जारी रहा तो अगले एक से डेढ़ महीने में बचा हुआ हिस्सा भी समाप्त हो जाएगा।

जानकारी के अनुसार, बीआरओ के अधीन कार्य कर रही निजी निर्माण कंपनियों द्वारा गिट्टी तैयार करने के लिए दो बड़े क्रशर प्लांट लगाए गए हैं। तुमालपाड़ गांव के कम्पार्टमेंट क्रमांक-475 स्थित 0.95 हेक्टेयर शासकीय भूमि पर साधारण पत्थर का खनन किया जा रहा है। पर्यावरणीय स्वीकृति, राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल की अनुमति और खनिज विभाग की वैध मंजूरी के बिना ही प्लांट संचालित किए जा रहे हैं। इसी के साथ पहाड़ों से लगातार पत्थर निकालकर सड़क निर्माण में उपयोग किया जा रहा है। बिना अनुमति खनन होने से राज्य सरकार को करोड़ों का राजस्व नुकसान हो रहा है। वहीं जंगल और पहाड़ों के तेजी से कटने से पर्यावरणीय संतुलन पर भी खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में सड़क निर्माण जरूरी है, लेकिन विकास की कीमत जंगल और पहाड़ों को खत्म कर नहीं चुकाई जानी चाहिए। उनका आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद प्रशासन ने अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की है।
खनिज विभाग ने माना- अभी अनुमति नहीं दी गई
खनिज निरीक्षक मंथन कैमरो ने बताया कि संबंधित स्थल के लिए एनओसी का आवेदन प्राप्त हुआ है, लेकिन अब तक किसी प्रकार की अनुमति जारी नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को भेज दी गई है। वहीं, डीएफओ अक्षय भोसले ने बताया कि संबंधित परियोजना के लिए वन विभाग द्वारा फॉरेस्ट क्लियरेंस जारी किया गया है।
पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने कहा कि तुमालपाड़ में हो रहा खनन पेसा अधिनियम और वन अधिकार कानून की भावना के विपरीत है। ग्राम सभा की अनुमति के बिना किसी भी परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। ऐसे में यदि वन विभाग ने ग्राम सभा की सहमति के बिना अनुमति दी है, तो यह पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। नक्सलवाद खत्म होने के बाद अब खनिज संपदा के दोहन का रास्ता खोला जा रहा है।
